Thursday, 11 September 2008

हर खुशी हे लोगो के दामन में,
पर एक खुशी के लिए वक्त नही ,
दिन रात दौड़ती दुनिया में ,
जिंदगी के लिए वक्त नही.

माँ की लौरी का एहसास तो हे ,
पर माँ को माँ कहने का वक्त नही,
सारे रिश्तो को हम मार चुके ,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक्त नही.

सारे नाम मोबाइल में है,
पर दोस्ती के लिए वक्त नही,
गैरो की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक्त नही।


आँखों में हे नींद बड़ी,
पर सोने के लिए वक्त नही,
दिल हे घामो से भरा हुआ ,
पर रोने का भी वक्त नही।

पैसों की दौड़ में इसे दौडे ,
कि थकने का भी वक्त नही ,
पराये एहसासों कि क्या बात करे,
जब अपने सपनो के लिए ही वक्त नही.

तू ही बता ऐ जिंदगी,
इस जिंदगी का क्या होगा ,
कि हरपाल मरने वालो को,
जीने के लिए भी वक्त नही।